गुनाहों का देवता की छाया में भटकता मुसाफ़िर कैफ़े
कभी-कभी किताबें हम पढ़ते नहीं वे हमें हमारे अपने पढ़े हुए अतीत के सहारे पढ़वा लेती हैं। मुसाफ़िर कैफ़े के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। सुधा और चंदर नाम जैसे ही सामने आए, भीतर कहीं गुनाहों का देवता की स्मृति अपने आप खुलने लगी एक उम्मीद, एक भावनात्मक पुनर्मिलन, कि शायद वही गहराई, वही टूटन, वही अनकहा प्रेम यहाँ किसी नए रूप में मिलेगा। और सच कहूं तो, किताब शुरू होने से पहले ही उसने मुझे अपने पक्ष में कर लिया था।
लेकिन जैसे-जैसे पन्ने आगे बढ़े, यह साफ होता गया कि यह आकर्षण सिर्फ नामों का था अर्थों का नहीं। यहाँ सुधा और चंदर हैं, पर उनके बीच वह तीव्रता नहीं, वह आंतरिक संघर्ष नहीं, जो उन्हें यादगार बनाता।
कई प्रसंग ऐसे आए जहाँ चंदर बार-बार सुधा को शादी के लिए मनाता है और वह मना करती रहती है। उसी बीच उसका गर्भवती होना यह स्थिति अपने आप में इतने गहरे सवाल उठाती है, लेकिन किताब उन सवालों से कतराती हुई लगती है। चंदर का किरदार यहाँ और भी उलझाता है वह प्रेम की बातें करता है, पर जिम्मेदारियों से भाग जाता है। यह जानते हुए भी कि सुधा के गर्भ में उसका बच्चा है, उसका यूँ हट जाना एक ऐसी नैतिक रिक्तता को दिखाता है, जिसे कहानी कभी गंभीरता से टटोलती ही नहीं।
बल्कि जो बात भीतर लगातार खटकती रही, वह यह थी कि जिस तरह चंदर सब कुछ छोड़कर “मुसाफ़िर कैफ़े” बनाने के लिए भाग सकता है, क्या सुधा के पास वैसा कोई विकल्प नहीं था? वह क्यों लौटती है? क्यों वह उसी व्यक्ति के पास वापस जाती है, जब उसके पास एक बेहतर, स्थिर जीवन का विकल्प मौजूद था एक ऐसा जीवन जहाँ वह अपने बच्चे के साथ खुश थी?
और यहीं आकर कहानी एक पुराने, घिसे-पिटे सिनेमा के क्लिशे में बदलने लगती है जहाँ दो प्रेमिकाओं को “बहन” बना देने का आसान रास्ता चुन लिया जाता है। यह समाधान कम, और कहानी के कठिन सवालों से बचने का एक सुविधाजनक तरीका ज्यादा लगता है।
पूरी किताब संवादों से भरी हुई है, लेकिन वे संवाद भी कहीं-न-कहीं बनावटी लगते हैं जैसे भावनाएँ गढ़ी गई हों, जी नहीं गई हों। किरदार विकसित नहीं होते, वे बस आते हैं और चले जाते हैं।
और अंत में, सबसे बड़ी दूरी यही रह जाती है कि मैं इन किरदारों से जुड़ ही नहीं पाती। न उनके प्रेम से, न उनके संघर्ष से, न उनके निर्णयों से। शायद मेरी अपेक्षाएँ बहुत अधिक थीं मैं एक गहरी, जटिल प्रेम कथा की तलाश में थी, लेकिन जो मिला, वह एक सतही, असंगत, और कई बार अपने ही सवालों से भागती हुई कहानी थी।
इसलिए “मुसाफ़िर कैफ़े” मेरे लिए एक ऐसी किताब बनकर रह गई, जो शुरुआत में अपनी स्मृतियों के सहारे लुभाती है, लेकिन अंत तक आते-आते अपने ही बनाए हुए वादों से दूर चली जाती है और पीछे छोड़ जाती है सिर्फ कुछ अधूरे, अनुत्तरित और थोड़े खीझ भरे सवाल।


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