पढ़ने और खुद को पढ़ने के बीच: अक्टूबर जंक्शन का अनुभव
बल्क में खरीदी किताबों का मायना अक्सर उसे कब पढ़ी जाती है उसमें रहता है । कंज्यूमरिज्म और मार्केटिंग के दौर में किताबों का हम तक पहुंचना आसान हुआ है । दिव्य प्रकाश दुबे कुछ ऐसे ही आए पहले मेरी फीड तक फिर अमेजोन, फ्लिपकार्ट और मिशों पे । आखिर इन सब ने मिलकर मुझे उनकी किताबें लेकर मनवाया ।
हालांकि साहित्य प्रेमी होने के नाते साहित्य किसीभी भाषा में मुझको लुभाता है । हिन्दी साहित्य कुछ ज्यादा क्यूंकि इसमें थोड़ा दिखावा करना मेरे लिए आसान हो जाता है । पहली किताब थी अक्टूबर जंक्शन। चित्रा और सुदीप के किरदार कैसे थे वो अभिभी में असमंजस में हु। हालांकि जबसे करीब करीब साहित्य क्या है ये समझने की भुलभुलैया में पड़ी हु वो साहित्य मुझको ज्यादा भाता है जिसमें अंत में खुद को देख सकूं।
चित्रा से थोड़ा जुड़ पाई बहुत ज्यादा नहीं। और सुदीप से जुड़ना बहुत हद तक नामुमकिन। अस्तित्ववादी कहानियां पढ़ने के बाद हालांकि मेरे लिए कामू, इसलिन, बेकेट ज्यादा लुभायमान रहे है , वही किरदार भाते है जो बहुत सामान्य हो जिसके प्रश्न सामान्य हो, जो रोजिंदे प्रश्नों से लड़ते हो । सुदीप उस मायने में मुझसे बहुत दूर था वो मुझे तमाशे के वेद की तरह पैसे वाला बिचारा लगा और उसी वजह से कह सकते है कि किताब से में दूर रही ।
जूलिया क्रिस्टीवा का टर्म इंटरटेक्चुअलिटी कहती है कैसे किताबें अपने मिनिंग माने अर्थ बनाती है दूसरी कही किताबों से बाते करके । उसी तरह कुछ अच्छा लगा तो वो था मुराकामी का संदर्भ। पूरी किताब में चित्रा और सुदीप मिलते थे मुराकामी की किताब में १० अक्टूबर लिखने से, साल। बतौर बदल रहे थे पर दिनांक यही रहती थी । उनके प्रश्नों से किस हद तक जुड़ पाई येतो पता नहीं पर इसने इस किताब को खास बनाया ।
उसके अतिरिकत लेखक का बार बार बीच में आना अच्छा लगा। बल्कि कहूं तो लेखक का बीच-बीच में आना मुझे उस तरह का अनुभव देता है जैसे कोई पर्दे के पीछे खड़ा होकर कहानी की डोर हल्के-हल्के हिला रहा हो—एक तरह की आत्म-जागरूकता (self-awareness) जो आज के पॉपुलर फिक्शन में कम ही दिखती है। दिव्य प्रकाश दुबे यहां सिर्फ कहानी नहीं कहते, बल्कि कहानी कहने की प्रक्रिया को भी हमारे सामने खोलते चलते हैं।

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