दो बच्चे, दो संसार: ‘आपका बंटी’ और ‘शर्त का तीसरा बटन’
कुछ महीने पहले मैंने आपका बंटी पढ़ना शुरू किया था। सच कहूँ तो इस किताब को पढ़ने का निर्णय किसी बहुत गहरी साहित्यिक तैयारी के बाद नहीं लिया था। किताब लगातार मेरी नज़र के सामने आ रही थी। सोशल मीडिया की reels में लोग इसे हिंदी साहित्य पढ़ने वालों के लिए recommend कर रहे थे। किताबों के sets में भी यह दिखाई दे रही थी। हर तरफ आपका बंटी था।
और जितना अधिक उसका नाम दिखाई देता, उतनी ही मेरी उत्सुकता बढ़ती।
साथ में थोड़ी शंका भी थी।
मैंने सोचा—क्या सचमुच यह किताब इतनी महत्वपूर्ण है, जितना लोग कह रहे हैं?
फिर जब किताब मेरे हाथ में आई और मैंने उसका blurb पढ़ा, तो वहाँ लगभग यह कहा गया था कि बीसवीं सदी के हिंदी साहित्य को आपका बंटी के बिना पूरी तरह समझना संभव नहीं। मैंने मन ही मन फिर सोचा—शायद यह थोड़ा अतिशयोक्तिपूर्ण दावा है।
लेकिन किताब पढ़ने के बाद मुझे अपनी ही उस शंका पर हँसी आई।
कुछ किताबें आपको कहानी सुनाती हैं।
कुछ किताबें आपको किसी पात्र से मिलाती हैं।
और कुछ किताबें ऐसी होती हैं जिनके बाद आप अपने आसपास की दुनिया को थोड़ा अलग ढंग से देखने लगते हैं।
मेरे लिए आपका बंटी ऐसी ही किताब रही।
बंटी से मिलना
जब मैंने उपन्यास शुरू किया तो मेरे सामने सबसे पहले एक बच्चा था—बंटी।
मुझे लगा था कि मैं एक ऐसे बच्चे की कहानी पढ़ रही हूँ जिसके माता-पिता अलग हो रहे हैं। तलाक की कहानी। एक टूटते परिवार की कहानी।
लेकिन कुछ ही पन्नों के बाद लगा कि यह तलाक की कहानी नहीं है।
यह उस बच्चे की कहानी है जिससे किसी ने पूछा ही नहीं कि उसके लिए परिवार का टूटना क्या अर्थ रखता है।
हम वयस्क अक्सर तलाक को दो लोगों के बीच का निर्णय मानते हैं। दो लोग साथ नहीं रह पा रहे, इसलिए अलग हो रहे हैं। उनके अपने कारण हैं, अपनी परिस्थितियाँ हैं, अपनी इच्छाएँ हैं।
लेकिन बच्चा कहाँ है?
वह इस निर्णय को किस भाषा में समझेगा?
क्या वह “वैवाहिक असंगति” समझता है?
क्या वह “अलगाव” समझता है?
नहीं।
वह केवल इतना समझता है कि जो माँ कल तक केवल उसकी थी, अब उसके समय में कोई दूसरा व्यक्ति भी है। जिस पिता के साथ वह घूमने जाता था, वह अब उसके साथ नहीं रहता। जिस घर को वह अपना समझता था, वह धीरे-धीरे किसी और का घर बनता जा रहा है।
और बंटी इसी बदलती हुई दुनिया के बीच खड़ा है।
बंटी की छोटी-छोटी खुशियाँ
बंटी को पढ़ते हुए मुझे बार-बार यह महसूस हुआ कि बच्चे की भावनाएँ छोटी नहीं होतीं, भले ही उसकी दुनिया छोटी हो।
उसके पिता उसे घुमाने ले जाते हैं। उसे कलकत्ता के बारे में बताते हैं, जहाँ वे रहते हैं। बंटी के मन में कलकत्ता की एक पूरी तस्वीर बनने लगती है। वह उस शहर को लेकर उत्सुक है। उसके पिता की बातें उसके लिए कल्पना का एक संसार बना देती हैं।
उसके लिए कलकत्ता केवल एक शहर नहीं है।
वह पिता की दुनिया है।
इसलिए जब माँ की दूसरी शादी के बाद वह सचमुच कलकत्ता पहुँचता है, तो वहाँ एक अजीब-सी epiphany होती है।
यह वह कलकत्ता नहीं है जिसकी उसने कल्पना की थी।
यहाँ के घर अलग हैं। लोग अलग हैं। वातावरण अलग है। उसके पिता का नया परिवार है। वहाँ एक छोटा बच्चा भी है।
और सबसे महत्वपूर्ण—उस कलकत्ता में बंटी के लिए वह जगह नहीं है जिसकी उसने अपने मन में कल्पना की थी।
वह वहाँ पहुँच तो गया, लेकिन कलकत्ता को अपना नहीं बना पाया।
वह अपने खिलौनों से नहीं खेलता।
वह चुप रहता है।
पढ़ने की कोशिश करता है, लेकिन पढ़ नहीं पाता।
स्कूल बदल जाता है और उसके लिए पढ़ाई भी सहज नहीं रह जाती।
एक शहर, जिसे उसने कभी पाने की इच्छा की थी, जब उसके सामने आता है, तो वह उसके लिए अपना नहीं बल्कि और भी अधिक पराया हो जाता है।
शायद बच्चों की इच्छाओं और उनकी वास्तविकताओं के बीच यही सबसे बड़ा अंतर है।
बंटी कलकत्ता जाना चाहता था।
लेकिन वह यह नहीं जानता था कि वह जिस कलकत्ता की कल्पना कर रहा है, उसमें उसके पिता हैं—जबकि वास्तविक कलकत्ता में उसके पिता का एक नया परिवार भी है।
“मेरे तो पिता वही हैं”
बंटी की मानसिक दुनिया को समझने वाला एक प्रसंग मुझे विशेष रूप से याद रह गया।
उसकी माँ की दूसरी शादी के बाद कोई व्यक्ति उससे उसका नाम पूछता है और उसके पिता का नाम पूछता है। बंटी अपने पहले पिता का नाम बताता है।
माँ नाराज़ हो जाती है।
और बंटी की प्रतिक्रिया लगभग उस पूरी मानसिक उलझन को खोल देती है—“तुमने दूसरी शादी कर ली है, मेरे तो पिता वही हैं।”
इस एक बात में बच्चे की पूरी दुनिया छिपी हुई है।
बड़ों के लिए विवाह बदल सकता है।
लेकिन बच्चे के लिए पिता नहीं बदलता।
वह संबंध को किसी कानूनी या सामाजिक व्यवस्था की तरह नहीं देखता। उसके लिए पिता वही व्यक्ति है जिसने उसे गोद में उठाया, घुमाया, खिलौने दिए, उसके साथ समय बिताया।
माँ ने दूसरा विवाह कर लिया है।
लेकिन बंटी के भीतर उसके पिता का स्थान कैसे बदल जाए?
वह तो उसके लिए वही हैं।
बंटी और उसका बगीचा
शायद बंटी को समझने का सबसे सुंदर रास्ता उसके बगीचे से होकर जाता है।
बंटी को बागवानी का बहुत शौक है। अपने पेड़-पौधों के बारे में उसे बहुत कुछ पता है। उसका बगीचा उसके लिए घर का कोई साधारण हिस्सा नहीं है। वह उसका अपना क्षेत्र है। वहाँ किसी को भी मनमाने ढंग से जाने की अनुमति नहीं।
यह उसका संसार है।
वह फूल चुनता है और अपनी माँ के चूड़े में लगाता है। अपनी आंटी के चूड़े में लगाता है। यहाँ तक कि अपनी माँ की दूसरी शादी से आई बेटी के लिए भी फूल लगाता है।
यह मुझे बहुत सुंदर लगा।
जिस बच्चे को अपने परिवार में अपनापन कम होता जा रहा है, वह अपने फूलों के माध्यम से सबको अपनापन देता रहता है।
उसने एक आम का पौधा भी लगाया है।
घर छोड़ने से पहले वह माली चाचा से पूछता है कि यह पेड़ कब बड़ा होगा। माली चाचा कहते हैं—जब तुम्हारी शादी होगी, तब तक यह बड़ा हो जाएगा।
बंटी घर छोड़ देता है, लेकिन जाते हुए भी अपने पौधों को नहीं भूलता। वह माली चाचा से कहता है कि उनका ध्यान रखना।
बाद में जब उसका मन नए घर में नहीं लगता, उसकी माँ उसके लिए बगीचे का सामान मँगवाती है। उसी के साथ वह आम का पौधा भी आता है।
लेकिन फिर उस पौधे के पुराने पत्ते सूखने लगते हैं।
बंटी की माँ माली चाचा से पूछती है—जब मिट्टी अच्छी है, पानी दिया जा रहा है, खाद दी जा रही है, फिर ये पत्ते क्यों सूख गए?
माली चाचा कहते हैं—क्योंकि वे पुराने हैं। वे झड़ेंगे। उनकी जगह नए पत्ते आएँगे।
इस छोटे-से प्रसंग में मुझे मनु भंडारी की लेखकीय बारीकी बहुत गहराई से दिखाई दी।
पुराने पत्ते। नए पत्ते।
और उसी के बीच बंटी।
उसका घर बदल रहा है।
माँ बदल रही है।
पिता का जीवन बदल चुका है।
नए लोग परिवार में आ रहे हैं।
नए संबंध बन रहे हैं।
और बंटी—जो उस पुराने संसार का हिस्सा था—धीरे-धीरे उस संसार से छूट रहा है।
पेड़ के लिए पुराने पत्तों का गिरना स्वाभाविक है।
लेकिन बंटी के लिए?
क्या पुराने को इतनी आसानी से छोड़ा जा सकता है?
मनु भंडारी ने कहीं यह नहीं कहा कि बंटी उस पुराने पत्ते की तरह है। उन्होंने केवल एक पेड़ को दिखाया और पाठक को स्वयं यह संबंध बनाने दिया।
यही उनकी लेखकीय संवेदना की खूबसूरती है।
बंटी के लिए परिवार का अर्थ
बंटी कई बार शरारत करता है। माँ उसे डाँटती है। वह नाराज़ होता है। ईर्ष्या करता है। कभी अपनी माँ को किसी और के साथ बाँटना नहीं चाहता।
लेकिन उसकी शरारतों के भीतर भी एक बच्चा है जो केवल यह चाहता है कि उसे छोड़ा न जाए।
और शायद यही बात आपका बंटी पढ़ते हुए मेरे लिए सबसे कठिन थी।
मैं बंटी को केवल पढ़ नहीं रही थी।
मैं उसके साथ चल रही थी।
उसका दुख मुझे परेशान कर रहा था।
उसकी छोटी-सी खुशी भी मुझे खुशी दे रही थी।
जब वह अपने पिता से मिलने जाता है, जब वह उनके साथ समय बिताता है, जब वह किसी छोटी-सी चीज़ को अपने दोस्तों को बताना चाहता है—तब मुझे लगता है कि बच्चों के लिए प्रेम कितना सरल होता है।
उन्हें बहुत कुछ नहीं चाहिए।
बस यह एहसास कि “मेरे पापा मेरे हैं।”
“मेरी माँ मेरी है।”
“मेरा घर मेरा है।”
और फिर बंटी से आगे
जब मैंने आपका बंटी समाप्त की, तो बंटी मेरे भीतर रह गया।
शायद इसीलिए इसके तुरंत बाद जब मैंने मानव कौल की शर्त का तीसरा बटन पढ़ना शुरू किया और वहाँ भी एक बालक की दृष्टि मिली, तो अनायास ही दोनों पात्रों की तुलना होने लगी।
राज़ील और बंटी एक जैसे नहीं हैं।
लेकिन दोनों अपने-अपने ढंग से वयस्कों की दुनिया के बीच अकेले पड़ जाते हैं।
और शायद इसी वजह से मुझे लगा कि इन दोनों किताबों को साथ पढ़ना चाहिए।
राज़ील की दुनिया
शर्त का तीसरा बटन की शुरुआत में मैं थोड़ी disconnected थी।
शायद इसलिए कि अभी-अभी मैं बंटी की दुनिया से बाहर निकली थी।
बंटी की संवेदनाएँ इतनी गहरी थीं कि मैं उससे भावनात्मक रूप से जुड़ चुकी थी। राज़ील को पढ़ते हुए वह जुड़ाव तुरंत नहीं बना।
लेकिन धीरे-धीरे मानव कौल की भाषा और कथा-शैली ने मुझे अपनी ओर खींच लिया।
राज़ील केवल घटनाएँ नहीं सुनाता। वह उन्हें अपनी कल्पना, स्मृति और साहित्यिक अनुभवों के माध्यम से समझता है।
और यहीं मुझे इस उपन्यास की सबसे सुंदर बात लगी—intertextuality।
चित्रलेखा और Dostoevsky का Crime and Punishment केवल संदर्भ नहीं रह जाते। वे राज़ील की मानसिक दुनिया का हिस्सा बन जाते हैं।
वह अपने आपको Raskolnikov में देखने लगता है।
अपने गाँव की गलियों में उसे Saint Petersburg दिखाई देता है।
वह अपने आसपास के पात्रों को उन साहित्यिक पात्रों के रूप में देखने लगता है जिन्हें उसने पढ़ा है।
एक बच्चे के मन पर साहित्य का इतना गहरा असर हो सकता है—यह विचार मुझे बहुत अच्छा लगा।
पाप, पुण्य और चित्रगुप्त
राज़ील लगातार चित्रगुप्त से बात करता है।
यह पाप है।
यह पुण्य है।
मैंने यह किया।
मैंने वह किया।
और फिर चित्रलेखा से निकला वह विचार उसके भीतर काम करता है कि पाप और पुण्य केवल किसी बाहर से बनाए गए स्थिर ढाँचे में तय नहीं होते; वे व्यक्ति और परिस्थिति से भी जुड़ते हैं।
राज़ील अपने लिए नैतिकता की एक निजी दुनिया बनाने की कोशिश करता है।
लेकिन वह अभी बच्चा है।
वह सब कुछ समझ नहीं सकता।
वह बहुत-सी चीज़ों को अधूरा छोड़ देता है।
कई बातें वह जानना ही नहीं चाहता।
कई बातों को वह अपनी कल्पना से पूरा करता है।
और यही उसकी कथा को इतना दिलचस्प बनाता है।
क्या सच है और क्या राज़ील की कल्पना?
पढ़ते-पढ़ते मेरे मन में बार-बार एक संदेह आया—
क्या राज़ील जो कुछ बता रहा है, वह सब सच है?
या वह अपनी स्मृतियों और कल्पनाओं से अपने लिए एक कहानी बना रहा है?
उसके कथन में कई जगह ऐसी अस्थिरता है कि पाठक निश्चित नहीं रह पाता।
और मुझे यही अनिश्चितता अच्छी लगी।
राज़ील अपने आसपास की घटनाओं को साहित्य के माध्यम से समझ रहा है। वह अपने आपको Raskolnikov में बदलता है। वह अपने गाँव को Saint Petersburg में बदल देता है।
लेकिन शायद सबसे बड़ा सवाल तब आता है जब चोटी के साथ हुए physical abuse और उसकी मृत्यु का अपराध-बोध उसके भीतर बैठ जाता है।
वास्तविकता में राज़ील ने उसे बचाने की कोशिश की थी। उसने चोटी के पिता को बताने की कोशिश की कि उसके साथ क्या हो रहा है। लेकिन उसकी बात नहीं मानी गई।
फिर भी चोटी की मृत्यु के बाद राज़ील स्वयं को किसी हद तक उसका जिम्मेदार मानने लगता है।
और यहाँ उसका Raskolnikov से संबंध और गहरा हो जाता है।
शर्ट का तीसरा बटन
लेकिन इस पूरी कहानी में जो दृश्य मुझे सबसे अधिक छू गया, वह चोटी से मिलने का है।
राज़ील अपनी स्कूल की वही शर्ट—जिसका तीसरा बटन इस पूरी कथा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है—लेकर चोटी से मिलने जाता है।
वह उससे बात करता है।
वह उससे वह सब कहता है जो शायद वह उसके रहते हुए नहीं कह पाया था।
वह उसे बचाना चाहता था।
वह अपनी दोस्ती वापस चाहता था।
वह उसके साथ रहना चाहता था।
लेकिन अब बहुत कुछ उसके हाथ से निकल चुका है।
यह दृश्य मेरे लिए केवल अपराध-बोध का दृश्य नहीं था।
यह एक बच्चे की उस इच्छा का दृश्य था जिसमें वह किसी बीती हुई चीज़ को वापस ठीक करना चाहता है।
समय भी उसके साथ बदलता रहता है
मानव कौल की writing style का एक और पहलू मुझे बहुत पसंद आया—समय का उनका इस्तेमाल।
राज़ील कभी वर्तमान में है, कभी अतीत में, कभी भविष्य के किसी बिंदु से अपने वर्तमान को देख रहा है।
वह जैसे पहले ही गाँव छोड़ चुका है और फिर पीछे मुड़कर देख रहा है कि जब वह वहाँ था, तब क्या सोच रहा था।
इससे कथा सीधी रेखा में नहीं चलती।
और शायद यही राज़ील के मन का स्वाभाविक रूप है।
उसका मन भी सीधा नहीं चलता।
वह स्मृति से कल्पना में जाता है, कल्पना से साहित्य में, साहित्य से अपराध-बोध में और फिर वापस वास्तविकता में।
अंत में दोनों किताबें मेरे साथ रह गईं
शायद इसीलिए मैंने इन दोनों किताबों को साथ पढ़ा।
एक बहुत पहले लिखी गई किताब।
एक अपेक्षाकृत नई किताब।
एक में बंटी है।
दूसरी में राज़ील।
दोनों बच्चे हैं।
दोनों अकेले हैं।
दोनों अपने आसपास की वयस्क दुनिया को समझने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन दोनों की दुनिया अलग है।
बंटी अपने टूटते हुए परिवार के बीच अपना संसार खो देता है।
राज़ील अपनी स्मृतियों, कल्पनाओं और किताबों के सहारे अपना संसार बनाता है।
बंटी की दुनिया में पौधे हैं, फूल हैं, खिलौने हैं, पिता हैं, माँ है, स्कूल है और एक ऐसा घर है जो धीरे-धीरे उसका नहीं रह जाता।
राज़ील की दुनिया में चित्रलेखा है, Raskolnikov है, Sonya है, चित्रगुप्त है, स्मृतियाँ हैं और ऐसे प्रश्न हैं जिनका कोई आसान उत्तर नहीं।
और अगर मुझसे पूछा जाए कि इन दोनों में से कौन-सी किताब मेरे साथ अधिक समय तक रहेगी, तो मेरा उत्तर होगा—आपका बंटी।
मानव कौल की शर्त का तीसरा बटन मुझे उनकी writing style के कारण याद रहेगी। मुझे उनका लिखने का तरीका पसंद आया—जिस तरह वे abstract विचारों को कथा में पिरोते हैं, जिस तरह साहित्य को पात्र के भीतर उतार देते हैं और जिस तरह वे समय और स्मृति को एक-दूसरे में मिला देते हैं।
लेकिन बंटी मेरे साथ कुछ और लेकर रहेगा।
अब शायद जब मैं किसी ऐसे बच्चे के बारे में सोचूँगी जिसके माता-पिता अलग हो रहे हैं, तो मैं केवल उन दो लोगों के बारे में नहीं सोच पाऊँगी।
मैं उस बच्चे के बारे में भी सोचूँगी।
वह क्या समझ रहा होगा?
क्या नहीं समझ रहा होगा?
क्या वह चुप है?
क्या वह अपने पिता के बारे में दोस्तों को कुछ बताना चाहता है?
क्या वह अपनी माँ को किसी और के साथ बाँट पा रहा है?
क्या उसे अपना नया घर अपना लग रहा है?
क्या वह अपने पुराने खिलौनों को याद करता है?
क्या उसके पास भी कोई छोटा-सा बगीचा है, जिसे वह अपना संसार मानता है?
शायद आपका बंटी की सबसे बड़ी सफलता यही है कि उसने मेरे भीतर यह प्रश्न हमेशा के लिए छोड़ दिया है।
बच्चा छोटा हो सकता है, उसकी समझ सीमित हो सकती है—लेकिन उसकी संवेदनाएँ कभी छोटी नहीं होतीं।
और शायद इन दोनों किताबों को पढ़कर मुझे सबसे अधिक यही समझ आया कि हम बड़े लोग बच्चों के संसार को अक्सर उनकी उम्र के बराबर छोटा समझ लेते हैं।
जबकि उनके भीतर भी पूरा एक संसार होता है।
एक ऐसा संसार जिसे वे हमेशा शब्दों में कह नहीं पाते।
कभी वे उसे फूलों में रखते हैं।
कभी खिलौनों में।
कभी किसी शहर की कल्पना में।
और कभी किसी किताब के पात्र में अपने आपको खोजकर।
शायद इसी वजह से ये दोनों किताबें मेरे लिए केवल दो उपन्यास नहीं रहीं।
ये दो बच्चों की दुनिया में की गई दो अलग यात्राएँ हैं—एक में बंटी मेरे साथ चलता रहा, और दूसरी में राज़ील मुझे यह दिखाता रहा कि एक बच्चा अपनी दुनिया को समझने के लिए साहित्य की दुनिया में कितना दूर जा सकता है।
और किताबें बंद हो जाने के बाद भी, दोनों में से एक आवाज़ अब भी मेरे भीतर है—
बंटी की।


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